अयोध्याधाम में लगभग 500 वर्षों की प्रतीक्षा के बाद श्री राम जन्मभूमि पर 22 जनवरी 2024 को भगवान रामलला की मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा के अवसर पर बच्चों के लिए विशेष-

प्यारे बच्चो,

अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि पर मंदिर के निर्माण के अवसर पर सम्पूर्ण देश राममय है। शीघ्र ही प्रभु के बाल्य स्वरूप की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा होने वाली है। आप भी सोचते होंगे कि  इसमें बच्चों के लिए क्या है? आइए, एक दृश्य देखते हैं-

टिंकू चलो, बहुत खेल लिए, अब घर आ जाओ। टिंकू जी कहते हैं, बस मम्मी, अभी आया ।

थोड़ी देर में मम्मी फिर बालकनी  में आकर आवाज लगाती हैं, टिंकू बेटा, चलो पापा बुला रहे हैं। टिंकू जी कहाँ मानने वाले हैं, मनुहार करते हुए कहते हैं , मम्मी बस 5 मिनट ।

हमारे घरों के आसपास और सोसाइटी में ऐसी बातचीत प्रायः सुनाई देती हैं ।

भगवान का बाल्य जीवन भी तो ऐसा ही है । पिता राजा दशरथ भोजन करने के लिए उन्हें बुलवाते हैं, तो बालक राम खेल छोड़ कर आना नहीं चाहते । माता कौशल्या जब उन्हें पकड़ने को आती हैं, तो प्रभु श्री राम ठुमकते हुए दूर भाग जाते हैं। गोस्वामी तुलसी दास जी  ने इस दृश्य को रामचरित मानस की चौपाइयों में कुछ इस प्रकार पिरोया  है:    

भोजन करत बोल जब राजा, नहिं आवत तजि बाल समाजा।

कोसल्या जब बोलन जाई, ठुमक–ठुमक प्रभु चलही पराई।    

धूल से भरे हुए बच्चे जब घर आते हैं, तो वे अपनी ही मस्ती में होते हैं। बालक राम भी धूल से भरे हुए वस्त्रों में महल में आते हैं, तो पिता आनंदित होकर उन्हें अपनी गोद में बैठा लेते हैं।

लेकिन बालक राम को एक स्थान पर बैठना कहाँ पसंद है। भोजन करते समय वे मुँह पर दही-भात लपेटे हुए इधर-उधर दौड़ रहे हैं। यह मनोरम दृश्य हर माता-पिता को मन्त्र मुग्ध कर देता है। महाकवि तुलसीदास जी  कहते हैं:

भोजन करत चपल चित इत उत अवसर पाइ,

भाजि चले किलकत मुख दधि ओदन लपटाइ।

श्री राम का जीवन अत्यंत सरल है। वे बड़े-छोटे सबसे प्रेम से मिलते हैं । किसी के बीच भेद-भाव नहीं करते ।

बालचरित अति सरल सुहाए,

सारद शेष संभु श्रुति गाए।

और बच्चो , आप ही की तरह बालक राम को भी अन्य भाइयों लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के साथ पढ़ने के लिए स्कूल अर्थात गुरुकुल भेजा जाता है। वे बहुत ही कम समय में अपनी विद्या , जिसमें पढ़ाई-लिखाई के अतिरिक्त धनुष विद्या आदि कार्यकलाप भी शामिल हैं, पूर्ण कर लेते हैं।

मानस की चौपाइयों में इस दृश्य को बहुत सुन्दर ढंग से समेटा गया है:

गुरुगृह पढ़न चले रघुराई,

अल्पकाल विद्या सब पाई।

विद्या विनय निपुण गुनसीला,

खेलहि खेल सकल नृप लीला।

करतल वान धनुष अति सोहा,

देखत रूप चराचर मोहा।

और आप जब छुट्टियों में किसी अन्य नगर में घूमने जाते हैं, तब वहाँ के बाज़ारों और शॉपिंगमाल की साज-सज्जा और अनूठापन आपको आकर्षित करती है। ठीक ऐसे ही जब राम, जनकपुरी के बाज़ारों में निकलते हैं , तो उत्सुकता के साथ अपनी प्रसन्नता भाई लक्ष्मण के साथ कुछ इस तरह बाँटते है: 

धनिक बनिक बर धनद समाना,

बैठे सकल वस्तु लाई नाना ।

चौखट सुन्दर गली सुहाई ,

संतत रहहि सुगंध सिंचाई ।

अर्थात धन के देवता कुबेर के समान धनाढ्य और बड़े व्यापारी अपनी दुकानें सजाये हुए हैं। नगर संरचना का वर्णन करते हुए वे कहते हैं कि नगर के चौराहे और गलियाँ बहुत सुन्दर है। सम्पूर्ण वातावरण सुगंधित होकर मन मोह रहा है।

तो देखा, भगवान राम का बचपन भी आप से अलग नहीं है ।

शेष फिर कभी…

तब तक के लिए राम –राम।